yahi hai aazmaana to sataana kisko kahte hain | यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं

  - Mirza Ghalib

यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो

  - Mirza Ghalib

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    रहम कर ज़ालिम कि क्या बूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
    नब्ज़-ए-बीमार-ए-वफ़ा दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है

    दिल-लगी की आरज़ू बेचैन रखती है हमें
    वर्ना याँ बे-रौनक़ी सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है

    नश्शा-ए-मय बे-चमन दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
    जाम दाग़-ए-अंदूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है

    दाग़-ए-रब्त-ए-हम हैं अहल-ए-बाग़ गर गुल हो शहीद
    लाला चश्म-ए-हसरत-आलूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है

    शोर है किस बज़्म की अर्ज़-ए-जराहत-ख़ाना का
    सुब्ह यक-बज़्म-ए-नमक सूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
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    Mirza Ghalib
    उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए
    बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए

    दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया
    मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए

    रखता फिरूँ हूँ ख़िर्क़ा ओ सज्जादा रहन-ए-मय
    मुद्दत हुई है दावत आब-ओ-हवा किए

    बे-सर्फ़ा ही गुज़रती है हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र
    हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किए

    मक़्दूर हो तो ख़ाक से पूछूँ कि ऐ लईम
    तू ने वो गंज-हा-ए-गराँ-माया क्या किए

    किस रोज़ तोहमतें न तराशा किए अदू
    किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किए

    सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
    देने लगा है बोसा बग़ैर इल्तिजा किए

    ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं
    भूले से उस ने सैकड़ों वा'दे वफ़ा किए

    'ग़ालिब' तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या
    माना कि तुम कहा किए और वो सुना किए
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    Mirza Ghalib
    हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
    इक छेड़ है वगरना मुराद इम्तिहाँ नहीं

    किस मुँह से शुक्र कीजिए इस लुत्फ़-ए-ख़ास का
    पुर्सिश है और पा-ए-सुख़न दरमियाँ नहीं

    हम को सितम अज़ीज़ सितमगर को हम अज़ीज़
    ना-मेहरबाँ नहीं है अगर मेहरबाँ नहीं

    बोसा नहीं न दीजिए दुश्नाम ही सही
    आख़िर ज़बाँ तो रखते हो तुम गर दहाँ नहीं

    हर-चंद जाँ-गुदाज़ी-ए-क़हर-ओ-इताब है
    हर-चंद पुश्त-ए-गर्मी-ए-ताब-ओ-तवाँ नहीं

    जाँ मुतरिब-ए-तराना-ए-हल-मिम-मज़ीद है
    लब पर्दा-संज-ए-ज़मज़मा-ए-अल-अमाँ नहीं

    ख़ंजर से चीर सीना अगर दिल न हो दो-नीम
    दिल में छुरी चुभो मिज़ा गर ख़ूँ-चकाँ नहीं

    है नंग-ए-सीना दिल अगर आतिश-कदा न हो
    है आर-ए-दिल नफ़स अगर आज़र-फ़िशाँ नहीं

    नुक़साँ नहीं जुनूँ में बला से हो घर ख़राब
    सौ गज़ ज़मीं के बदले बयाबाँ गिराँ नहीं

    कहते हो क्या लिखा है तिरी सरनविश्त में
    गोया जबीं पे सजदा-ए-बुत का निशाँ नहीं

    पाता हूँ उस से दाद कुछ अपने कलाम की
    रूहुल-क़ुदुस अगरचे मिरा हम-ज़बाँ नहीं

    जाँ है बहा-ए-बोसा वले क्यूँ कहे अभी
    'ग़ालिब' को जानता है कि वो नीम-जाँ नहीं

    जिस जा कि पा-ए-सैल-ए-बला दरमियाँ नहीं
    दीवानगाँ को वाँ हवस-ए-ख़ानमाँ नहीं

    गुल ग़ुन्चग़ी में ग़र्क़ा-ए-दरिया-ए-रंग है
    ऐ आगही फ़रेब-ए-तमाशा कहाँ नहीं

    किस जुर्म से है चश्म तुझे हसरत क़ुबूल
    बर्ग-ए-हिना मगर मिज़ा-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ नहीं

    हर रंग-ए-गर्दिश आइना ईजाद-ए-दर्द है
    अश्क-ए-सहाब जुज़ ब-विदा-ए-ख़िज़ाँ नहीं

    जुज़ इज्ज़ क्या करूँ ब-तमन्ना-ए-बे-ख़ुदी
    ताक़त हरीफ़-ए-सख़्ती-ए-ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं

    इबरत से पूछ दर्द-ए-परेशानी-ए-निगाह
    ये गर्द-ए-वहम जुज़ बसर-ए-इम्तिहाँ नहीं

    बर्क़-ए-बजान-ए-हौसला आतिश-फ़गन 'असद'
    ऐ दिल-फ़सुर्दा ताक़त-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ नहीं
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    Mirza Ghalib
    नश्शा-हा शादाब-ए-रंग-ओ-साज़-हा मस्त-ए-तरब
    शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है
    Mirza Ghalib
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    हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
    कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
    Mirza Ghalib
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