जिस्म जलने लगा है तिरी तिश्नगी से सनम
प्यास बुझती नहीं क्यूँ मिरी मय-कशी से सनम
एक अर्सा हुआ क्यूँ तिरी याद आई नहीं
एक अर्सा हुआ बिछड़े मुझ को ख़ुशी से सनम
देख कर आइना सोचता हूँ मैं अक्सर यही
टूट जाए न रिश्ता कहीं बे-ख़ुदी से सनम
— Ankur Mishra
प्यास बुझती नहीं क्यूँ मिरी मय-कशी से सनम
एक अर्सा हुआ क्यूँ तिरी याद आई नहीं
एक अर्सा हुआ बिछड़े मुझ को ख़ुशी से सनम
देख कर आइना सोचता हूँ मैं अक्सर यही
टूट जाए न रिश्ता कहीं बे-ख़ुदी से सनम
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