ग़ज़ल ऐसी कहें इक लाश जी बैठे
पहाड़ों को गले लग कर नदी बैठे
तुम्हारी लत भला कैसी लगी हम को
जो हम इक घूॅंट में ये रात पी बैठे
उन्हें आभास कैसे हो मुहब्बत जो
नहीं गंगा किनारे पर कभी बैठे
हैं हम जिस मोड़ पर है वो बहुत नाज़ुक
ज़रूरी है कि हर रस्ता सही बैठे
भले बैठा न बैठा तू मिरे दर पर
तिरे दर पर मगर हरदम अली बैठे
— Krishna Mishra















