जाने कौन ज़माने की मुझ को ये हवा लगी है
ये हर वक़्त भला बनने की कैसी अदा लगी है
मैं ने इश्क़ के मारे लड़कों को बावला कहा बस
ऐसा खेल हुआ मेरी मुझ को बद-दुआ लगी है
है बस एक ही मुट्ठी के जितना दिल जिसे न जाने
दुनिया मुट्ठी में करने की आख़िर ऐसी क्या लगी है
— Krishna Mishra















