करूँँगा क्या मैं आख़िर ज़र्फ़ का ऐसे जवाँ होकर
मुकर जाती है जब आवाज़ मेरी अब बयाँ होकर
तो मेरी ही किसी ख़्वाहिश की ये मंज़िल रहा होगा
मेरा रस्ता गुज़रता है अगर साक़ी यहाँ होकर
कहूँ कैसे मैं दुनिया को मेरा महबूब अच्छा है
मैं तो अब भी भटकता हूँ यहाँ होकर वहाँ होकर
लुटा देता है सब सपने जो सारे शौक़ बच्चों पर
ख़ुदा आता है धरती पर पिता होकर या माँ होकर
मेरी जलती चिता के पास इक दीपक जला जाना
तेरी खिड़की पे आऊँगा मैं इक जुगनू की जाँ होकर
मुझे डर है कि रह जाऊँ न बस अख़बार में दबकर
मुझे तो था कि मर कर भी मैं निकलूँ दास्ताँ होकर
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