अब कुछ धुआँ भी चाहती है सरगिरानी के लिए

आई है कितनी दूर से ये आग पानी के लिए

ऐ रात शायद तुझ को ये घंघोर अँधेरा दे सुकून
मैं ओढ़ लूँगा अब्र तेरी शादमानी के लिए

सबका बयाॅं मेरे ख़िलाफ़ आया मगर तुम चुप रहे
मैं दाद देता हूँ तुम्हें इस बे-ज़बानी के लिए

अपने अधूरेपन की लौ से अब बुझा दूँगा इसे
किरदार मेरा आग है पूरी कहानी के लिए

पैग़ाम उस के दर से आया था मिला इज़्न-ए-सफ़र
तैयार है हर शख़्स अपनी जाँ-फ़िशानी के लिए

फिर प्यास ने भी माशकी की खाल आख़िर खींच ली
था इस तअल्लुक़ में बहुत कुछ खींचा-तानी के लिए

इक आदमी है आइने में जिस की ज़िद है ख़ुश रहूँ
मैं लड़ पड़ा हूँ ख़ुद से ग़म की पासबानी के लिए

शायद मुझे सहरा के ख़ालीपन पे रोना आएगा
शायद तरस जाएगी मेरी आँख पानी के लिए

— Miyan Umar

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