है ख़ुमार-ए रसूम-ओ-क़यूद मगर

न हुनर है न ख़्वाहिश-ए अर्ज़-ए हुनर

है अजब ये हिरास-ए शब-ए हिज्राॅं
दिखे है मुझे शम्स-ब-शक्ल-ए-क़मर

कहूँ कैसे हक़ीक़त-ए ज़ीस्त को मैं
कोई दम है ये हैअत-ए रक़्स-ए-शरर

हैं अदम में अनासिर-ए-चारागरी
जो ये नींद खुले न हो दर्द बसर

तेरे नज्द-ए-नदीद की ख़ैर मियाॅं
है जुनूॅं का अहाता फ़सील-ए-नज़र

— Miyan Umar

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