baahar hisaar-e-zabt se aanaa pada mujhe | बाहर हिसार-ए-ज़ब्त से आना पड़ा मुझे

  - Manmauji

बाहर हिसार-ए-ज़ब्त से आना पड़ा मुझे
आख़िर मलाल-ए-रूह बताना पड़ा मुझे

मस्कन अराइशी में थी ख़ुशियाँ ही लाज़मी
सो ग़म को शायरी में सजाना पड़ा मुझे

कर बैठा कल बक़ाया फ़राइज़ का मैं हिसाब
साँसों का फिर हिसाब लगाना पड़ा मुझे

इक शे’र हुस्न-ए-यार की रा’नाइयों पे था
अफ़सोस, महफ़िलों में सुनाना पड़ा मुझे

तन्हा ही इस जहान में आया था मैं कभी
तन्हा ही इस जहान से जाना पड़ा मुझे

दिल से ज़रा ग़रीब था दिल का मकीं मेरा
मेयार इस लिए भी गिराना पड़ा मुझे

‘मौजी’ मुहब्बतों की रिवायत अजीब थी
ख़ुद रूठ के भी उनको मनाना पड़ा मुझे

  - Manmauji

Muflisi Shayari

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