बर्फ़ बेकार में पिघल गई है
इस मुहब्बत की उम्र ढल गई है
उस का घर देखने के चक्कर में
मेरे क़स्बे की बस निकल गई है
एक झूठा बयान देने पर
दो क़बीलों में जंग टल गई है
मेरा होता हुआ नहीं हुआ वो
गेंद पकड़ी मगर फिसल गई है
हादसा हाथ मल रहा होगा
कार उलटती हुई सँभल गई है
— Nadir Ariz















