hadf pe itne saleeqe se vaar karte hain | हदफ़ पे इतने सलीक़े से वार करते हैं

  - Nadir Ariz

हदफ़ पे इतने सलीक़े से वार करते हैं
हम एक तीर से दो-दो शिकार करते हैं

हमारी भूल पे महशर बपा करें ये लोग
और अपने जुर्म को लग़्ज़िश शुमार करते हैं

क़दम-क़दम पे अना से निपटना पड़ता है
हम अपने आपको मुश्किल से पार करते हैं

घने दरख़्तों का मैं अहतराम करता हूँ
कि ये हमारी फ़ज़ा साज़गार करते हैं

इक और रस्म रवायत का हिस्सा बनती है
हम इक ख़ता को अगर बार बार करते हैं

तुम्हारे वादों पे ‘नादिर’ ख़ुशी हुई, लेकिन
हम आज़माते हैं फिर एतिबार करते हैं

  - Nadir Ariz

Bekhabri Shayari

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