इक तिरे वस्ल के लिए मौला

हिज्र काटे हैं अन-गिने मौला

इक सना-ख़्वाँ था महव-ए-हम्द-ए-यार
और हम नाचते रहे मौला

मैं जिन्हें दिल पे खाए फिरता हूँ
तिरे हिस्से के रंज थे मौला

वो जो तुझ से उठे थे वो पर्दे
मेरी हस्ती पे पड़ गए मौला

सूरत-ए-ला में तेरी सूरत को
हम ने देखा तो हम ही थे मौला

तुझ को रो रो मनाया करते थे
तुझ से कैसे न रूठते मौला

तेरे बंदे बहुत कमीने हैं
हौसले पस्त हो गए मौला

— Naeem Sarmad

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Judai Shayari

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