एक दिन उस बेहया ने शब्द अनसुलझे कहे
माँ ने जिस बेटे की ख़ातिर उम्र भर ता'ने सहे
दो घड़ी है ज़िन्दगी दो-चार पल खुल के जियो
फिर किसी को क्या पता है कौन कब कैसे रहे
लोग ये मँझधार में डूबे हैं फिर मारे गए
मानकर दुनिया को सच बे-वक़्त जो बहते रहे
हम भी तेरे साथ हैं कह कर गए दिखते नहीं
अब तलक हूँ सोच में अल्फ़ाज़ ये किस ने कहे
लोग हैं वे ही सबब जो घर में है वीरानगी
एक ही छत के तले कुछ लोग जो घर में रहे
— nakul kumar















