घरौंदे शजर से उतर जाऍंगे
परिंदे ये शाख़ों पे मर जाऍंगे
हमें छोड़ दो आसमाँ में अभी
ज़मीं पे गिरेंगे तो मर जाऍंगे
मुहब्बत में टूटे सितारे कई
समेटो नहीं तो बिखर जाऍंगे
इधर जाऍंगे या उधर जाऍंगे
यही एक दुनिया किधर जाऍंगे
जहाँ और भी हैं मकाँ और भी
यहाँ से निकाले तो घर जाऍंगे
हमारी भी मंज़िल वही एक है
उधर जाऍंगे सब जिधर जाऍंगे
न जाएगा कुछ भी यहाँ साथ में
ये सूखे हुए कुछ शजर जाऍंगे
भुलाया है तुझ को यूँ अब मेरी जाँ
कि तुझ से मिले बे-असर जाऍंगे
यूँ मत घूमिए आइने की तरह
नहीं तो दिलों से उतर जाऍंगे
— nakul kumar















