कौन तिरे घर की दीवारें चौखट चूमेगा
कौन तिरी आँखों में आके ख़ुद को रोपेगा
कौन बताएगा तुझ को तू दुनिया है उस की
कौन तिरी दुनिया में अपनी दुनिया देखेगा
कौन तिरे होंठों पे घोले होंठों की शक्कर
कौन तिरी साँसों में अपनी साँसें घोलेगा
कौन तुझे बोलेगा अपने ख़्वाबों की मलिका
कौन तुझे महबूबा अपनी खुलकर बोलेगा
कौन तिरी साँसों को पी कर हो जाए पागल
कौन तुझे फ़िरदौस कहेगा साक़ी बोलेगा
कौन यूँ तेरे हिज्र को आख़िर जीते जाएगा
कौन तेरी यादों में नाचे गाए झूमेगा
कौन कभी सुरखाब बने महताब तुझे बोले
कौन कभी रातों में तेरी राहें देखेगा
— nakul kumar















