मैं जैसे हो गया था इक सिकंदर
मुझे मारा तो मेरे घर के अंदर
मैं कोई दर-ब-दर दरिया नहीं हूँ
मुझे समझो मैं जैसे हूँ समुंदर
जो मुझ को देख कर छुपती है दुनिया
यहाँ कुछ और है पर्दे के अंदर
यही तो इश्क़ में हासिल है प्यारे
न जाने हो गए कितने क़लंदर
— nakul kumar















