ज़िन्दगी अपने लिए ख़ुद मौत बोती जाएगी
शाम होते ही घनेरी रात होती जाएगी
एक दिन मेरी चिता तैयार कर लेंगे सभी
और फिर शाम-ओ-सहर बरसात होती जाएगी
ये अँधेरा आदमी के ख़्वाब खाता जाएगा
ये अभागन रात भी सब रात रोती जाएगी
कोशिशें करता रहूँगा लाख मैं ज़िंदा रहूँ
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी मरघट पिरोती जाएगी
फिर किसी के नाम से मुझ को उभारा जाएगा
फिर मुहब्बत फिर मुझे फिर से डुबोती जाएगी
— nakul kumar















