तो मैं समझूँ कि चमन छोड़ के जाओगे नहीं

है ना या'नी कि बदन छोड़ के जाओगे नहीं

मैं ने समझा था किसी घर की तरह है बाहें
मुझ को लगता था कफ़न छोड़ के जाओगे नहीं

आग से आग का मिलना तो ग़लत है फिर भी
प्यास कहती है जलन छोड़ के जाओगे नहीं

और दुनिया को तमाशे की तरह गर देखो
ख़त्म होने पे शिकन छोड़ के जाओगे नहीं

'नीर' या'नी है सुख़न तीर पे रक्खी वहशत
बा'द मछली के हिरन छोड़ के जाओगे नहीं

— Neeraj Neer

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Mulaqat Shayari

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