तू क़रीब आए तो क़ुर्बत का यूँँ इज़हार करूँँ
आइना सामने रख कर तिरा दीदार करूँँ
सामने तेरे करूँँ हार का अपनी एलान
और अकेले में तिरी जीत से इंकार करूँँ
पहले सोचूँ उसे फिर उस की बनाऊँ तस्वीर
और फिर उस में ही पैदा दर-ओ-दीवार करूँँ
मिरे क़ब्ज़े में न मिट्टी है न बादल न हवा
फिर भी चाहत है कि हर शाख़ समर-बार करूँँ
सुब्ह होते ही उभर आती है सालिम हो कर
वही दीवार जिसे रोज़ मैं मिस्मार करूँँ
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