उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ
रात के बा'द दिन आज के बा'द कल जो हुआ सो हुआ
जब तलक साँस है भूक है प्यास है ये ही इतिहास है
रख के काँधे पे हल खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ
ख़ून से तर-ब-तर कर के हर रहगुज़र थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह फिर से चूल्हे में जल जो हुआ सो हुआ
जो मरा क्यूँँ मरा जो लुटा क्यूँँ लुटा जो जला क्यूँँ जला
मुद्दतों से हैं ग़म इन सवालों के हल जो हुआ सो हुआ
मंदिरों में भजन मस्जिदों में अज़ाँ आदमी है कहाँ
आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ सो हुआ
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Nida Fazli
our suggestion based on Nida Fazli
As you were reading Udas Shayari Shayari