"आईना"

दर्द सीने में उभरता है वो कल कह दूँगा
आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

मेरे दिल के किसी कोने में हुई है हलचल
तीर मारा है अगर तू ने तो फिर अब के सँभल
तेरी आँखों का वो नमकीन सा छल कह दूँगा
आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

मैं समुंदर की तरह ख़ुद में छुपा लूँगा तुझे
सिर्फ़ सीने से नहीं दिल से लगा लूँगा तुझे
तेरे कमसिन से बदन को मैं कँवल कह दूँगा
आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

बे-ज़बाँ इश्क़ की ख़ामोश गवाही की क़सम
हुस्न की मौज ने बरपाई तबाही की क़सम
नौनिहालों के दिलों में जो ख़लल कह दूँगा
आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

तुम समझते हो कि मैं कुछ तो भरम रक्खूँगा
सच बताने में भी कुछ दीन-धरम रक्खूँगा
बातों-बातों में कोई चुभती मसल कह दूँगा
आइने जैसी कोई शोख़ ग़ज़ल कह दूँगा

— Nityanand Vajpayee

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