"आँखें"
मद भरी झील सी नीली हैं तुम्हारी आँखें
मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें
नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा बिजली गिराती इन की
मुझ को दीवाना सदाएँ भी बनाती इन की
शरबती शोख़ सजीली हैं तुम्हारी आँखें
मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें
सातों सागर से ज़ियादा हैं कहीं राज़ इन
में
इतना कुछ कह के भी होती नहीं आवाज़ इन
में
क़ातिलाना हैं चुटीली हैं तुम्हारी आँखें
मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें
नग़्मा-ए-इश्क़ को सुन सुन के तड़पती हैं ये
याद दिलवर की सताए तो छलकती हैं ये
नील कँवलों सी रँगीली हैं तुम्हारी आँखें
मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें
शोख़ रुख़सारों की चिलमन में छुपे दो हीरे
दे के दीदार ज़माने को थके वो हीरे
इस क़दर तन्हा लजीली हैं तुम्हारी आँखें
मयक़दों से भी नशीली हैं तुम्हारी आँखें















