कभी करूँँगा सनम तुझ सेे अब सवाल नहीं
रहे भले ही तुझे अब मेरा ख़याल नहीं
उठाए नाज़ तेरे सौ हज़ारों दर्द सहे
हमारे 'इश्क़ सी दुनिया में है मिसाल नहीं
तुम्हें लगा के गले ग़म ही ग़म मिला बेशक़
मगर ये दिल है कि इसको कोई मलाल नहीं
ख़ुदा ने जिसको मसीहा बना के भेजा हो
भला करे न किसी का तो फिर कमाल नहीं
ज़मीन-ए-इश्क़ को ज़रखेज़ जो बना देता
मैं ढूँढ़ता हूँ मिला अब भी वो जमाल नहीं
तू रोज़ रोज़ मुझे छोड़ता पकड़ता क्यूँ
समझ सका मैं तेरी शातिराना चाल नहीं
जो 'नित्य' नैनों के गहरे भँवर से बच निकला
उसे डुबो दे समंदर की भी मजाल नहीं
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