हमारे दिल को क्यूँ जी तुमने तंबूरा बनाया है
नचाते उँगलियों पर जैसे जम्बूरा बनाया है
वो जो पत्थर हमारे सर पे मारा फेंककर तुमने
उसी से हमने अपने घर का कंगूरा बनाया है
अधूरा प्यार था कोई कि इकतरफ़ा मुहब्बत थी
हमारी शाइरी ने लो उसे पूरा बनाया है
बचा ही मैं कहाँ दिलबर मेरे भीतर कहीं भी अब
तुम्हारी चाहतों ने इस क़दर चूरा बनाया है
हज़ारों आशिक़ों में सब सेे पहली सफ़ में मैं ही था
मगर उस बेवफ़ा ने राह का घूरा बनाया है
मैं उन सहराओं में इतने दिनों तक घूमा हूँ उपमन्यु
लिपट कर रेत ने मुझ काले को भूरा बनाया है
Read Full