मैं ख़ुद ही अपनी बहार से रूठने लगूँ गर
तो तुम मुझे रूठने न देना
जो वार लम्हे का हो वो सहना
ये सोच लेना
कि एक लम्हा गुरेज़ का
कैसे
मोहब्बतों की इक उम्र पामाल कर के गुज़र रहा है
— Obaidullah Aleem
तो तुम मुझे रूठने न देना
जो वार लम्हे का हो वो सहना
ये सोच लेना
कि एक लम्हा गुरेज़ का
कैसे
मोहब्बतों की इक उम्र पामाल कर के गुज़र रहा है
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