इश्क़ में हूँ

कुछ दिनों से सोचती हूँ पहले सी अब क्यूँ नहीं हूँ
मैं जहाँ हूँ वो वहीं है वो जहाँ है मैं वहीं हूँ
बैठी थी लिखने ग़ज़ल इक नाम लिखती जा रही हूँ
चाँद तारे फूल तितली सब से सब बतला रही हूँ
धूप आँगन में वही है फिर भी छत पे जा रही हूँ
तंग है मुझ से रज़ा भी भाव इतने खा रही हूँ
आईना शरमा रहा है सो मैं भी शरमा रही हूँ
बातें करने लगती हूँ तो ओ हो अच्छा ठीक ही है
खुशबूएं सी हर कहीं है तू ही तू है मैं नहीं है
डर रही हूँ हिज्र से भी नख़रे भी पर कम नहीं है
सारे लॉजिक खो गए हैं वॉयलिन बजने लगे हैं
फिल्में सच लगने लगी है गानों में अब फील सी है
जाल में मैं इश्क़ के हूँ इश्क़ में हूँ इश्क़ से हूँ
इश्क़ की हूँ इश्क़ सी हूँ इश्क़ ही हूँ इश्क़ ही हूँ

— Parul Singh "Noor"

More by Parul Singh "Noor"

Other nazm from the same pen

See all from Parul Singh "Noor" →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling