qusoor ho to hamaare hisaab mein likh jaaye | क़ुसूर हो तो हमारे हिसाब में लिख जाए

  - Parveen Shakir

क़ुसूर हो तो हमारे हिसाब में लिख जाए
मोहब्बतों में जो एहसान हो तुम्हारा हो

  - Parveen Shakir

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    जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें
    बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए
    Parveen Shakir
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    हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न
    बंद मुझ पर जब से उस के घर का दरवाज़ा हुआ
    Parveen Shakir
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    वो हम नहीं जिन्हें सहना ये जब्र आ जाता
    तिरी जुदाई में किस तरह सब्र आ जाता

    फ़सीलें तोड़ न देते जो अब के अहल-ए-क़फ़स
    तू और तरह का एलान-ए-जब्र आ जाता

    वो फ़ासला था दुआ और मुस्तजाबी में
    कि धूप माँगने जाते तो अब्र आ जाता

    वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया
    बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता

    वज़ीर ओ शाह भी ख़स-ख़ानों से निकल आते
    अगर गुमान में अँगार-ए-क़ब्र आ जाता
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    Parveen Shakir
    उस से इक बार तो रूठूँ मैं उसी की मानिंद
    और मेरी तरह से वो मुझ को मनाने आए
    Parveen Shakir
    ये क्या कि वो जब चाहे मुझे छीन ले मुझ से
    अपने लिए वो शख़्स तड़पता भी तो देखूँ
    Parveen Shakir
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