“हर्फ़-ए-मुहब्बत”
मैं
हिज्र के आँगन में
चराग़एसुख़न
जला कर
जुगनुओं से कहूँगा
कि उस से निकलती
ख़ुश्बूओं की
हिफाज़त करना
रात के शानों पर
हाथ रख कर
वफ़ाओं का सूरज
निकलने देना
देखना
एक दिन
हर्फ़एमुहब्बत
ज़रूर जनम लेगा
— Piyush Nishchal
मैं
हिज्र के आँगन में
चराग़एसुख़न
जला कर
जुगनुओं से कहूँगा
कि उस से निकलती
ख़ुश्बूओं की
हिफाज़त करना
रात के शानों पर
हाथ रख कर
वफ़ाओं का सूरज
निकलने देना
देखना
एक दिन
हर्फ़एमुहब्बत
ज़रूर जनम लेगा
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