“सिर्फ़ तुम”

कभी बारिश की आब में
कभी ग़ज़ल की किताब में
कभी सुनहरे किसी ख़्वाब में
कभी इश्क़ के जवाब में
सिर्फ़ तुम नज़र आती हो

कभी शीतल किसी रात में
कभी पुराने किसी नग़्मात में
कभी क़लम से निकले जज़्बात में
कभी भेजे तुम्हारे सौग़ात में
सिर्फ़ तुम नज़र आती हो

कभी नदियों की धार में
कभी पंछियों की गुहार में
कभी प्यार के ख़ुमार में
कभी अश्क के फुहार में
सिर्फ़ तुम नज़र आती हो

कभी किसी की आवाज़ में
कभी किसी के अन्दाज़ में
कभी अपने ही अल्फ़ाज़ में
कभी गीत में कभी साज़ में
सिर्फ़ तुम नज़र आती हो
सिर्फ़ तुम नज़र आती हो

— Prakash Pandey

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