मिरे घर में मुहब्बत का हर इक सामान बाक़ी है
तिरा ग़म है नशा है और मुझ में जान बाक़ी है
मिरे दिल में यही इक आख़िरी अरमान बाक़ी है
अभी तुझ पे लिखी इक नज़्म का उन्वान बाक़ी है
ये उम्र-ए-इंतिज़ार-ए-इश्क़ बढ़ती ही रहेगी यूँ
तिरे लौट आने का जब तक कोई इम्कान बाक़ी है
मिटाएगा कहाँ तक तू मिरे दिल के उजालों को
मेरी नज़रों में अब भी एक रौशनदान बाक़ी है
गुज़रते दौर ने मुझ को यही इक बात समझाई
जहाँ दरबान ज़िंदा है वहीं ईमान बाक़ी है
मुहब्बत के मकाँ तो ढह गए सब दिल मुहल्ले में
तुझे जो आना है तो आ बस इक दालान बाक़ी है
— Pravendra Anuragi















