समुंदर का मुसाफ़िर मैं किनारा भूल जाता हूँ
सफ़र का मैं हमेशा ही तरीक़ा भूल जाता हूँ
मिरी इस ज़िंदगी का तुम लगा सकते हो अंदाज़ा
ग़ज़ल अब याद रहती है लतीफ़ा भूल जाता हूँ
बहुत पागल समझता है ज़माना इसलिए मुझ को
मुहब्बत में हमेशा ही मुनाफ़ा भूल जाता हूँ
बताता हूँ सभी को मैं उसूल-ए-ज़िंदगी मेरा
मैं इंसाँ याद रखता हूँ घराना भूल जाता हूँ
— Pravendra Anuragi















