ग़म में डूबों को हँसाने के लिए काफ़ी हूँ
फूल सहरा में खिलाने के लिए काफ़ी हूँ
रास आए है यूँ तन्हाई के साए गहरे
रात को दिन सा बनाने के लिए काफ़ी हूँ
ख़ुद को जो आइने सा मान के बैठे हैं इधर
कैफ़ियत उन की दिखाने के लिए काफ़ी हूँ
शाद हो कर यहाँ जीना है ज़रूरी सब को
शा'इरी से ये बताने के लिए काफ़ी हूँ
शम्अ' बन के जो जले 'प्रीत' भरी महफ़िल में
आग हर दिल में लगाने के लिए काफ़ी हूँ
— Harpreet Kaur















