क्या कहूँ कुछ कहा भी नहीं जाता हैबिन तिरे अब रहा भी नहीं जाता हैज़ख़्म ऐसा के मरहम कोई भी नहींमुझ से ये सब सहा भी नहीं जाता है— Parvez Shaikh