मुझे उड़ने की आदत हो गई है
परिंदो से मुहब्बत हो गई है
खड़ी रहती हैं मूरत की तरह ये
उदासी भी इमारत हो गई है
कफ़न में लिपटी हैं साँसें हमारी
बहुत नाज़ुक तबीअत हो गई है
बहारों में तुम्हें देखा है जब से
मुझे रंगों से रग़बत हो गई है
अँगूठी देनी है मुझको किसी को
मगर पैसों की क़िल्लत हो गई है
तेरी यादों से लड़ता हूँ मुसलसल
मेरी ख़ुद से बग़ावत हो गई है
यही अंजाम होना था हमारा
रचित मरने की सूरत हो गई है
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