क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो?

कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
क्या अब भी तन्हा रातें हैं?
क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं?
क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती?
क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती?
क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है?
क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है?
इन बातों का क्या मतलब है?
कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो?
क्या भीतर-भीतर गुनते हो?
क्यूँ हँसना-रोना भूल गए?
क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो?
क्या दिल को कहीं लगाए हो?
क्या इश्क़ में धोका खाए हो?
क्या ऐसा ही कुछ मसअला है?
कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

— Raghav Ramkaran

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