zindagi ko zakham ki lazzat se mat mahroom kar | ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर

  - Rahat Indori

ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर
रास्ते के पत्थरों से ख़ैरियत मा'लूम कर

टूट कर बिखरी हुई तलवार के टुकड़े समेट
और अपने हार जाने का सबब मा'लूम कर

जागती आँखों के ख़्वाबों को ग़ज़ल का नाम दे
रात भर की करवटों का ज़ाइक़ा मंज़ूम कर

शाम तक लौट आऊँगा हाथों का ख़ाली-पन लिए
आज फिर निकला हूँ मैं घर से हथेली चूम कर

मत सिखा लहजे को अपनी बर्छियों के पैंतरे
ज़िंदा रहना है तो लहजे को ज़रा मा'सूम कर

  - Rahat Indori

Raasta Shayari

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As you were reading Shayari by Rahat Indori

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    ये शरारत है, सियासत है, के है साज़िश कोई
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    एक समंदर अपने सूखे होंठ लेकर आ गया

    अपने दरवाज़े पे मैंने पहले खुद आवाज़ दी
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    मैने बस्ती में कदम रखा तो यू लगा
    जैसे जंगल मेरे पैरो से लिपट कर आ गया

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    Rahat Indori
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    अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे
    चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे

    तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
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    परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे

    ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू
    बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

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