apne haakim ki fakeeri pe taras aata hai | अपने हाकिम की फ़कीरी पे तरस आता है

  - Rahat Indori

अपने हाकिम की फ़कीरी पे तरस आता है
जो ग़रीबों से पसीने की कमाई माँगे

  - Rahat Indori

Mazdoor Shayari

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    मुझ को ख़्वाहिश है उसी शान की दिवाली की
    लक्ष्मी देश में उल्फ़त की शब-ओ-रोज़ रहे

    देश को प्यार से मेहनत से सँवारें मिल कर
    अहल-ए-भारत के दिलों में ये 'कँवल' सोज़ रहे
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    Kanval Dibaivi
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    फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
    मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
    Altaf Hussain Hali
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    Faiz Ahmad Faiz
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    मिट्टी बेच रहा हूँ जिसमें कोई जाल फ़रेब नहीं
    सोना चाँदी दूध मिठाई सब जा'ली है बाबूजी
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    Gyan Prakash Akul
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    हमारे गाँव में अब भी ये रस्म क़ायम है
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    Bahadur Shah Zafar
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    कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया
    उदासी की मेहनत ठिकाने लगी
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    मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम मज़दूर की दुनिया काली है
    Jameel Mazhari
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As you were reading Shayari by Rahat Indori

    दोस्ती जब किसी से की जाए
    दुश्मनों की भी राय ली जाए
    Rahat Indori
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    कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे
    जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे

    मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का
    इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे

    बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन
    उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे

    पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज
    कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे

    मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
    समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
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    Rahat Indori
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    बचा के रक्खी थी कुछ रौशनी ज़माने से
    हवा चराग़ उड़ा ले गयी सिराहने से

    नसीहतें ना करो इश्क़ करने वालों को
    ये आग और भड़क जायेगी बुझाने से

    बहकते रहने की आदत है मेरे क़दमों को
    शराबखाने से निकलू की चायखाने से
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    Rahat Indori
    सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए
    सोचता हूँ कोई अख़बार निकाला जाए

    पी के जो मस्त हैं उन से तो कोई ख़ौफ़ नहीं
    पी के जो होश में हैं उन को सँभाला जाए

    आसमाँ ही नहीं इक चाँद भी रहता है यहाँ
    भूल कर भी कभी पत्थर न उछाला जाए
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    Rahat Indori
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    वो इक इक बात पे रोने लगा था
    समुंदर आबरू खोने लगा था

    लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी
    मैं आँखें खोल कर सोने लगा था

    चुराता हूँ अब आँखें आइनों से
    ख़ुदा का सामना होने लगा था

    वो अब आईने धोता फिर रहा है
    उसे चेहरे पे शक होने लगा था

    मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया
    मैं सब के सामने रोने लगा था
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    Rahat Indori

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