ज़िंदगी भर कहाँ मज़ा देगी
एक मौक़ा मगर क़ज़ा देगी
सारी दुनिया मेरे ख़िलाफ़ नहीं
फिर भी मुमकिन है बद्दुआ देगी
आग दिल में लगे या बस्ती में
सबको जलने का मशवरा देगी
रात का दिल दुखेगा ऐसे में
रौशनी जब भी मुस्कुरा देगी
आसमाँ पर कोई ज़मीन नहीं
ये ज़मीन आसमाँ को क्या देगी
मैं भी सहरा की सम्त भागूँगा
जब भी आवारगी सदा देगी
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