tab talak kuchh bhi nahin teer ya talwaar gire | तब तलक कुछ भी नहीं तीर या तलवार गिरे

  - ARahman Ansari

तब तलक कुछ भी नहीं तीर या तलवार गिरे
फ़र्क़ पड़ता है अगर जंग में सालार गिरे

हम ने मिलने पे जो हर बार बचा रक्खी थी
अब के मिलना है तो फिर बीच की दीवार गिरे

ख़ुद को था
में हुए ले आए हैं मंज़िल के क़रीब
ये अलग बात कि रस्ते में कई बार गिरे

यूँँ तो गिरते हुए देखे हैं सरों को मक़्तल
तेरी ख़्वाहिश भी रही होगी कि दस्तार गिरे

बेच देते हैं यहाँ झूट को हम सच कह कर
इक ज़रा जुम्बिश-ए-लब हो तो ये बाज़ार गिरे

  - ARahman Ansari

Jhooth Shayari

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