muntazir hoon ki sitaaron ki zara aankh lage | मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे

  - Rahat Indori

मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे
चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा कर के

  - Rahat Indori

Ishaara Shayari

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    एक दिन मेरी ख़ामुशी ने मुझे
    लफ़्ज़ की ओट से इशारा किया
    Anjum Saleemi
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    इशारों ही में हाल-ए-दिल मैं सारा खोल जाता हूँ
    बहुत ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ बोल जाता हूँ
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
    मैं साँसें तक लुटा सकता हूँ उसके इक इशारे पर
    मगर वो मेरे हर वादे को सरकारी समझता है
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    ये हवा लौट गई कुछ तो इशारा कर के
    Shaan
    दूर साहिल से कोई शोख़ इशारा भी नहीं
    डूबने वाले को तिनके का सहारा भी नहीं
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    ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
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    यूँ तो वो इत्रदान था लेकिन ये क्या हुआ
    टूटा तो एक सम्त भी ख़ुशबू नहीं गई
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    Ghulam Murtaza Rahi
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    कोई इशारा दिलासा न कोई वादा मगर
    जब आई शाम तिरा इंतिज़ार करने लगे
    Waseem Barelvi
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    प्यार करने की हिम्मत नहीं उनके पास और हमसे किनारा भी होता नहीं
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    उसको उम्मीद है ऐश होगी बसर साथ में जब रहेगी मिरे वो मगर
    मुझपे जितनी मुहब्बत बची है सखी इतने में तो गुज़ारा भी होता नहीं
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    सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
    किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है
    Rahat Indori
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    रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
    चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

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    वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता है

    अपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब
    रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है

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    उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
    धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
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    Rahat Indori
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    सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
    ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

    शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं
    शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए

    मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है
    मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए

    मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में
    तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए

    ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में
    ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए

    मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
    इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
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    Rahat Indori
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    माँ के क़दमों के निशाँ हैं कि दिए रौशन हैं
    ग़ौर से देख यहीं पर कहीं जन्नत होगी
    Rahat Indori
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    मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या
    बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या

    आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा
    और मैं क्या क्या करूँ मर जाऊँ क्या

    तेरे जलसे में तेरा परचम लिए
    सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या

    कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो
    मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या

    एक पत्थर है वो मेरी राह का
    गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या

    फिर जगाया तूने सोए शेर को
    फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या
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    Rahat Indori
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