sar par saath aakaash zameen par saath samundar bikhre hain | सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं

  - Rahat Indori

सर पर सात आकाश ज़मीं पर सात समुंदर बिखरे हैं
आँखें छोटी पड़ जाती हैं इतने मंज़र बिखरे हैं

ज़िंदा रहना खेल नहीं है इस आबाद ख़राबे में
वो भी अक्सर टूट गया है हम भी अक्सर बिखरे हैं

उस बस्ती के लोगों से जब बातें कीं तो ये जाना
दुनिया भर को जोड़ने वाले अंदर अंदर बिखरे हैं

इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है
नींदें कमरों में जागी हैं ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं

आँगन के मा'सूम शजर ने एक कहानी लिक्खी है
इतने फल शाख़ों पे नहीं थे जितने पत्थर बिखरे हैं

सारी धरती सारे मौसम एक ही जैसे लगते हैं
आँखों आँखों क़ैद हुए थे मंज़र मंज़र बिखरे हैं

  - Rahat Indori

Fantasy Shayari

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