आप मेरी आँखों में क्या देखते हैं
लोग तो बस मुझ को तन्हा देखते हैं
पा नहीं सकते हक़ीक़त में जिसे हम
ख़्वाब में हम उस को अपना देखते हैं
गाँवों में छुड़वाते हैं बस लड़ने से लोग
शहर में तो सब तमाशा देखते हैं
बोलना हम को भी आता है पलटकर
क्या करें हम यार रिश्ता देखते हैं
कह नहीं पाते हैं कुछ भी बूढ़े माँ बाप
अपने बच्चों में सहारा देखते हैं
याद आ जाती हैं अपनी ग़लतियाँ फिर
हम किसी को जब भी मरता देखते हैं
— Rajat Bhardwaj















