हर हवा में नई ताज़गी लगती थी
माँ थी तो ज़िंदगी ज़िंदगी लगती थी
हम दवा से कहाँ ठीक होते थे तब
हम को तो दर्द की शा'इरी लगती थी
दौर वो देखा है ज़िन्दा रहने से जब
मुझ को आसान ये ख़ुद-कुशी लगती थी
अब नहीं जानता उस को वो कौन है
हाँ कभी पहले मेरी कोई लगती थी
मैं समझता था जिस को मुहब्बत 'रजत'
उस को तो बस ये सब दोस्ती लगती थी
— Rajat Bhardwaj















