सोचता हूँ कि नसीबा यूँँ निखारा जाए

ग़म के दिन हो भी तो हँस हँस के गुज़ारा जाए

हम को धोखे ही मुसीबत में मिले यारों से
क्यूँ न दुश्मन को ही इस बार पुकारा जाए

मुफ़लिसी में भी ख़ुदा सब्र मुझे दे इतना
जान जाए भले ईमाँ न हमारा जाए

मौज साहिल सा वो अब रब्त निभाता मुझ से
यूँ लगे छूटता हर बार किनारा जाए

ज़िन्दगी चैन सुकूँ ख़्वाब जाँ दिल और ख़ुशी
तू बता और भला तुझ पे क्या वारा जाए

तेरी दुनिया तेरे बंदे तो जुदा क़िस्मत क्यूँ
मेरे हक़ में भी कोई तोड़ा सितारा जाए

— Rajesh fard unnavi

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