ढलेगी शाम तो यूँँ घर में जा के रोएगा

चराग़ कमरे के सारे बुझा के रोएगा

कभी जो वस्ल की शब याद आ गई उस को
वो अपनी बाँहों में तकिया दबा के रोएगा

बिछड़ते वक़्त तो वो मुस्कुराएगा लेकिन
हमें ख़बर है कि वो दूर जा के रोएगा

उसे है मेरी वफ़ाओं पे शक मगर मुझ को
वो आज़माएगा फिर आज़मा के रोएगा

किसी ने पूछ लिया गर सबब उदासी का
उसी को अपने गले से लगा के रोएगा

अभी तो उम्र के नश्शे में खोया रहता है
ढलेगी उम्र तो क़िस्से सुना के रोएगा

— Rajesh fard unnavi

More by Rajesh fard unnavi

Other ghazal from the same pen

See all from Rajesh fard unnavi →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling