उसे ही सोचते रहते हो रात भर बैठे
किसी को इतना न चाहो कि दिल में डर बैठे
उस एक शख़्स को हम भूलने की कोशिश में
न जाने कितनी दफ़ा उस को याद कर बैठे
वही निगाह जो हम पे कभी उठी ही नहीं
उसी निगाह की चाहत में हम तो मर बैठे
तड़प ये प्यार की हम को तबाह कर देगी
न जाने किस घड़ी में हम ये प्यार कर बैठे
तुम्हारे बहस की इक और बात है लेकिन
कभी मिली नहीं मंज़िल किसी को घर बैठे
तू इतना कहता है तो ठीक है मगर 'राकेश'
किसी की बीती नहीं ऐसे रात भर बैठे
— Rakesh Mahadiuree















