ये रिज़्क़-ए-अश्क फ़राहम बहम किया जाए
हमारी आँख पे रहम-ओ-करम किया जाए
मुरीदनी के दुपट्टे की सम्त लपका था
जनाब-ए-पीर का बाज़ू क़लम किया जाए
वो इतना ढ़ेर हसीं था कि हम पे वाजिब है
तमाम उम्र बिछड़ने का ग़म किया जाए
ज़मीं को अर्श-ए-मुअल्ला तलक रिसाई मिले
फ़लक को खींच के मिट्टी में ज़म किया जाए
— Rakib Mukhtar















