मोहब्बत को अक़ीदा आशिक़ी को दीन कहता था
कोई था जो मेरी हर बात पर आमीन कहता था
वो हर हर साँस में जपता था मेरे नाम की माला
कभी मेहताब कहता था कभी माहीन कहता था
उसे हर ज़ाइक़ा मिलता था मेरे नर्म होंठो से
कभी शीरीं बताता था कभी नमकीन कहता था
— Rashida Maheen Malik















