उस की तकरार से डर लगता है
बीवी के वार से डर लगता है
बेवफ़ाई न अयाँ हो जाए
झाड़ू की मार से डर लगता है
जाने किस बात पे कब लड़ जाए
अपने ही यार से डर लगता है
गर्म चाय न गिराए फिर से
उस की फुंकार से डर लगता है
हाँ में हाँ गर न मिला पाऊँ मैं
उस के फिर प्यार से डर लगता है
चुप रहूँ तो भी ग़लत हो जाऊँ
अपने इज़हार से डर लगता है
घर में रुकना भी तो चुभता है उसे
अब तो इतवार से डर लगता है
इश्क़ बदले न कहीं शादी में
लफ़्ज़ की धार से डर लगता है
लोग हँसते हैं मिरी हालत पर
अपने किरदार से डर लगता है
— REHAN KHAN















