ज़िंदगी एक ख़्वाब की सी है
हिज्र की शब अज़ाब की सी है
बात उसके लबों की क्या पूछो
जैसे नर्मी गुलाब की सी है
चश्म-ए-दिल खोला तो ये राज़ खुला
हर हक़ीक़त ही ख़्वाब की सी है
ख़ाक छानी है तेरे कूचे की
ज़िंदगी इज़्तिराब की सी है
तेरे रुख़सार पर जो ये तिल है
एक सूरत किताब की सी है
शोर-ए-महशर सा कुछ है बस्ती में
ये सदा इंक़िलाब की सी है
ज़िंदगी आतिश-ए-मोहब्बत है
दिल की हालत कबाब की सी है
दिल में इक आग सी दहकती है
आँख मौज-ए-सहाब की सी है
जाम की क्या बिसात क्या हस्री
आँख उसकी शराब की सी है
अपनी 'रेहान' बे-सबाती भी
इक चमकते हबाब की सी है
— REHAN KHAN















