दर्द की शाम ढल जाएगी
ज़िंदगी फिर संभल जाएगी
रात भर शम्अ' जलती रहे
बाद-ए-सब में पिघल जाएगी
क़त्ल कर नीम-कश चश्म से
मौत मेरी बदल जाएगी
काम राही का तो चलना है
ख़ुद ब ख़ुद राह मिल जाएगी
आज को जी लें मस्ती से हम
चाह ये भी निकल जाएगी
— Rizwan Khoja "Kalp"
ज़िंदगी फिर संभल जाएगी
रात भर शम्अ' जलती रहे
बाद-ए-सब में पिघल जाएगी
क़त्ल कर नीम-कश चश्म से
मौत मेरी बदल जाएगी
काम राही का तो चलना है
ख़ुद ब ख़ुद राह मिल जाएगी
आज को जी लें मस्ती से हम
चाह ये भी निकल जाएगी
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